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महाकाली में बड़े पैमाने पर अवैध खनन

भारत-नेपाल सीमा पर बहने वाली महाकाली के किनारे बलतड़ी से तालेश्वर तक कई स्थानों पर अवैध तरीके से खनन हो रहा है। इससे नदी के किनारे कट रहे हैं। अवैध खनन करने वालों के कारण सड़कों की हालत भी खराब है। अवैध खनन करने वाले ग्रामीणों को धमका भी रहे हैं। अवैध खनन करने वालों में प्रशासन, पुलिस की टीमों पर नजर रखने को फील्डर तैनात किए हैं। इसके चलते जैसे ही कोई टीम कार्रवाई के लिए रवाना होती है, वह पहले ही अवैध खनन में लगे लोगों को सचेत कर देते हैं और टीमों को करीब खाली हाथ लौटना पड़ता है।
नदियों का सर्वेक्षण करने वाली टीम ने 2015 में महाकाली का भी सर्वे किया था और अपनी रिपोर्ट में कहा था कि महाकाली में हो रहे खनन के कारण नदी भारतीय क्षेत्र को काट रहे हैं। टीम ने नदी से खनन न करने की रिपोर्ट शासन को दी थी।

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पारा चढ़ते ही गहराने लगा जल संकट

संवाद सहयोगी, चम्पावत : पर्वतीय क्षेत्रों में भी पारा चढ़ने के साथ-साथ पानी के संकट का ग्राफ भी लगातार बढ़ रहा है। लोग हैंडपंप और प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर बने हुए हैं और कई किमी पैदल चलकर पानी भरने को विवश हैं।

पिछले दिनों हुई बारिश से कुछ राहत मिली है, लेकिन जल संकट पर लगाम नहीं पाई है। नगर क्षेत्र में जल संस्थान दो दिन छोड़कर लोगों को पानी मुहैया करा रहा है। नलों में दो दिन बाद पानी लोगों का जमावड़ा लग रहा है। घर के नलों तक पानी न पहुंचने से स्टैंड पोस्टों में लोगों की लंबी लाइन देखने को मिल रही हैं। बारिश होने के बावजूद प्राकृतिक जल स्रोत फुल रिचार्ज नहीं हो पाए हैं। जल संकट से निपटने के लिए भी जल संस्थान तैयारियों में जुट गया है। महकमे ने पेयजल से निपटने के लिए आपूर्ति करना शुरू कर दिया है। टैंकर के जरिए जीआइसी, कनलगांव और एक पिकअप के जरिए मल्ली बाजार व गली मोहल्लों में पानी की सप्लाई की जा रही है। लोग पानी के लिए कई किमी चलने को मजबूर हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में तो और भी बुरा हाल बना हुआ है। धौरे-नाले से पानी लाकर लोग अपनी प्यास बुझा रहे हैं। प्राकृतिक जल स्रोतों पर ही लोगों की निर्भरता बनी हुई है। आने वाले दिनों में बढ़ती गर्मी के साथ ही जल संकट भी बढ़ने की उम्मीद है।

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पशुपालन के प्रति कम हो रहा रूझान

संवाद सहयोगी, चम्पावत : जिले में ग्रामीणों का रूझान पशुपालन व खेती की ओर लगातार कम होते जा रहा है। लेकिन अब गांवों से पलायन की मार इन परंपरागत व्यवसायों में पड़ी है। जिससे पशुपालन का क्रेज घटते जा रहा है।

जिले के अधिकांश गांवों में पिछले सात-आठ वर्ष पूर्व भैंस व बकरी पालन के प्रति लोगों का रुझान काफी अधिक था। भैंस की देखरेख अधिक होने व उसे पालने में आने वाली अधिक लागत तथा चारा कम होने से अब लोगों ने इन्हें पालना काफी कम कर दिया है। इससे दूध उत्पादन पर भी असर पड़ा है। भैंस पालन की उपेक्षा ग्रामीणों का रुझान संकर नस्ल की गायों के प्रति बढ़ा है। इससे दूध की कमी जिले में नहीं है। पिछले 10 वर्षो में संकर नस्ल की गायों में कृत्रिम गर्भाधान 10 गुना तक बढ़ा है। बकरी पालन के प्रति भी लोगों का मोह कम हो रहा है। पूर्व में जिले में 65 हजार बकरियां थी लेकिन अब यह 50 हजार ही रह गई हैं।

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महाकाली में समा रही धारचूला की गंदगी

लगभग 12 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित कालापानी से निकलने वाली महाकाली में आगे गुंजी से कुटीयांगती नदी और तवाघाट में धौली नदी मिल जाती है। कालापानी से बूंदी के बीच इस नदी में दर्जनों ग्लेशियरों का पानी मिलता है। तवाघाट पहुंचने तक महाकाली का पानी एकदम साफ नजर आता है, लेकिन उससे आगे जैसे ही यह नदी बढ़ती है तो उसके किनारे स्थित सारी आबादी की गंदगी उसमें समाती है। धारचूला में तो हर मोहल्ले के सीवर की गंदगी वर्षों से महाकाली को प्रदूषित कर रही है।

दोबाट से आगे बढ़ते ही नदी में जगह-जगह सीवर की गंदगी, कचरा, कूड़ा आदि गिरता रहता है। देशभर में नदियों को बचाने का अभियान चल रहा है, लेकिन अब तक महाकाली में कभी कोई स्वच्छता अभियान नहीं चला। बताया गया है कि तपोवन, ग्वालगांव, निगालपानी, बलुवाकोट, जौलजीबी में सारी कस्बे और नगर की गंदगी महाकाली में समाती रहती है। धारचूला बाजार के लगभग हर मोहल्ले के सीवर के पिटों के मुंह महाकाली की तरफ खुले हुए हैं। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि जब कभी धारचूला में पेयजल संकट गहराता है तो लोग महाकाली से ही पानी लाकर पीते हैं। मजबूरी के समय लोगों को यह पता नहीं रहता कि नदी में व्यापक स्तर पर गंदगी पटी है।

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काली, गोरी का संगम भी गंदगी से अछूता नहीं

जौलजीबी में महाकाली और गोरी का संगम होता है। इसी संगम में ज्वालेश्वर महादेव का मंदिर है। जब कैलाश मानसरोवर यात्रा पैदल होती थी तो यात्री ज्वालेश्वर महादेव मंदिर में पूजा-अर्चना करते थे। यह बात अलग है कि अब यात्री जौलजीबी में नहीं रुकते। जौलजीबी में भी अन्य कस्बों की तरह गंदगी का साम्राज्य है। कस्बे की सारी गंदगी का निस्तारण काली और गोरी में ही किया जाता है। जौलजीबी में 14 नवंबर से व्यापारिक मेला लगता है लेकिन मेले के दौरान भी सफाई के पुख्ता प्रबंध नहीं किए जाते। आज भी इन नदियों के किनारे लोग शौच के लिए जाते हैं। नदी के किनारे फैले रहने वाली गंदगी को कभी साफ नहीं किया जाता। बारिश के सीजन में जब नदियां तट तक भरती हैं तभी खुद ही इसकी सफाई हो जाती है।

जौलजीबी में अब तक वृहद स्तर का कोई सफाई अभियान नहीं चला है। नदियों को साफ करने के लिए न तो सरकारी स्तर पर कोई अभियान चलाया गया और न स्थानीय लोगों ने इसमें रुचि दिखाई। जौलजीबी में महाकाली में मिलने के बाद गोरी का नाम भी महाकाली ही हो जाता है। महाकाली के किनारे नेपाल की तरफ से भी गंदगी पटती रहती है। वहां के कस्बों और गांवों की गंदगी को महाकाली में ही फेंका जाता है। अपने मूल स्रोत से एकदम साफ अवस्था में निकलने वाली यह दोनों नदियां आबादी वाले क्षेत्र में पहुंचते ही प्रदूषण का शिकार हो जाती हैं।

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State braces itself to tackle forest fires

Dehradun, April 3

With the mercury rising sharply, Uttarakhand has started making efforts to tackle forest fires. An expanse of 85 hectares of forests in the state has already been affected due to forest fires with as many as 57 forest fire incidents recorded since February 15, the official date of start of the forest fire season in the state. Out of the 85 hectares, 32.20 hectares are part of reserve forests.

 

With around 65 per cent of its geographical area under forests, Uttarakhand every summer faces the challenge of forest fires.

 

Most of these forest fires are manmade. Both intentional and human carelessness contribute to these forest fires. Burning of crop residues or even bonfires by tourists in close proximity of forest areas result in forest fires. But another major factor is the presence of chir (pine) trees in large numbers in Uttarakhand forests. The pine needles that fall on the ground are like tinder boxes, which are mostly responsible for forest fires.

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95 में से 32 नहरें बंद, सिंचाई हो रही प्रभावित

चंपावत जिले में करीब एक-तिहाई नहरें बंद हैं। बंद नहरों को शुरू करना भी चुनौती बन रहा है। 95 नहरों में से 32 नहरें बद हो गई है। 1115 हेक्टेयर जमीन की सिंचाई के बजाय महज 733 हेक्टेयर एरिया में ही सिंचाई हो पा रही है।

पहाड़ में किसान मुख्य रूप से बारिश पर आश्रित हैं, लेकिन समय पर बारिश नहीं होने से उनकी मेहनत पर पानी फिर रहा है। वैसे भी ढेरों नहरें बंद हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में सिंचाई साधनों की कमी से किसानों को दिक्कत झेलनी पड़ती है। करीब 27 हजार हेक्टेयर खेती योग्य जमीन में सिंचाई व लघु सिंचाई विभाग की नहर और गूलों से बमुश्किल 15 प्रतिशत में ही सिंचाई की सुविधा है।

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जंगल की आग आबादी तक पहुंची, दो मकान जले

पिथौरागढ़, [जेएनएन]: पहाड़ के जंगलों में आग लगने का सिलसिला शुरू हो गया है। शीतकालीन बारिश कम होने के परिणाम सामने आने लगे हैं। जंगलो में नमी की कमी से चौड़ी पत्ती वाले जंगल भी आग की चपेट में आ रहे हैं। पिथौरागढ़ के चण्डाक के जंगल में शनिवार रात से आग लगी है, जिसे रविवार तक बुझाया नहीं जा सका है। नतीजतन आग जंगल में बड़े क्षेत्र में फैल चुकी है। इधर अल्मोड़ा जिले के रानीखेत क्षेत्र में जंगल में लगी आग आबादी तक पहुंच गई।

रविवार को ताड़ीखेत विकासखंड के रिखोली गांव के वन पंचायत में आग धधक गई। तेज हवा के चलते लपटें आबादी तक पहुंच गईं। देखते ही देखते आग ने दो खाली पड़े मकानों को जद में ले लिया। ग्राम प्रधान मुन्नी देवी ने इसकी सूचना राजस्व पुलिस को दी।

सूचना मिलने पर राजस्व उप निरीक्षक कुंदन सिंह बिष्ट घटना स्थल पर पहुंचे। उनके अनुसार आग में मोहन राम पुत्र बची राम व प्रकाश चंद्र पुत्र नंद राम के खाली पड़े मकानों के पिछले भाग में आग लग गई। जिससे मकान का पिछला भाग जलकर राख हो गया।

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